Beautiful shayari for love | Love shayari for mahboob

◆कोई ना-मेहरबाँ अब मेहरबाँ है
   कहाँ है उम्र-ए-रफ़्ता तू कहाँ है
      ~अज्ञात
उम्र-ए-रफ़्ता=उम्र जो गुज़र गयी】

◆सब हैं उन के देखने वाले मगर
   आईने पर मेहरबानी और है
        ~  जलील मानिकपूरी
Beautiful love shayari


◆मुझ पे हो जाए तिरी चश्म-ए-करम गर पल भर
  फिर मैं ये दोनों जहाँ ''बात ज़रा सी'' लिक्खूँ
    ~  फ़रहत शहज़ाद
【चश्म-ए-करम=आंखों की इनायत】

◆ए मुसव्विर, 
   मुझे दिखती है जो तसव्वुर में, 
    तू,
   वो तस्वीर बना पाएगा 
      ~  अज्ञात
【मुसव्विर=चित्रकार】

◆सलाम तेरी मुरव्वत को मेहरबानी को
  मिला इक और नया सिलसिला कहानी को
  ~   ख़ुर्शीद अहमद जामी
【मुरव्वत=दयालुता】
Shayari for love couple,Love shayari

◆ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में
   हमारे हाल पर कुछ मेहरबानी अब भी होती है
    ~  अख़्तर शीरानी
तसव्वुर=ख्यालों में】

◆मेरी आँखों में अभी ख़्वाब की और गुंजाइश है ,
   यानि इक बार अभी और मोहब्बत होगी
      ~ अज्ञात

◆वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
  दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए
   ~   अमीर मीनाई
【वस्ल=मुलाक़ात,मुख़्तसर=सीमित】

◆ज़रा सँभलूँ भी तो वो आँखों से पिला देता है
   मेरा महबूब मुझे होश में रहने नहीं देता
     ~ तौक़ीर अहमद

◆मरता है जो महबूब की ठोकर पे 'नज़ीर' आह
  फिर उस को कभी और कोई लत नहीं लगती
     ~ नज़ीर अकबराबादी

◆मेरे दिल ओ दिमाग़ पे छाए हुए हो तुम
   ज़र्रे को आफ़्ताब बनाए हुए हो तुम
      ~ असर महबूब
【ज़र्रे=चिंगारी,आफ़्ताब=सूरज】

◆मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब
   देर से चाँद निकलना भी ग़लत लगता है
      ~अहमद कमाल परवाज़ी
【महबूब-परस्ती =प्रिय को पूर्ण समर्पित,
     अज़ाब=दुःख,तकलीफ】

◆सब दिखाते हैं तिरा अक्स मिरी आँखों में
  हम ज़माने को इसी तौर से महबूब हुए
    ~ अनवर मोअज़्ज़म
【अक्स=परछाईं】

◆मुहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ चलती है,
  कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता।
      ~अज्ञात
नशेमन=घोंसला】

◆चश्म-ए-मस्त उस की याद आने लगी
  फिर ज़बाँ मेरी लड़खड़ाने लगी
      ~अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
【चश्म-ए-मस्त=प्यारी आंखे】

◆कहते -कहते वो ,रुक गए दिल की,
   इश्क़ है कहने में,थोड़ी झिझक तो आती है !
      ~अज्ञात

◆क्या करूँ की मेरी ख्वाहिशों का दायरा बहुत छोटा है,                 तुम्ही से शुरू होता है और तुम पर ही सिमट जाता है।   
   ~अज्ञात      

◆उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ 
  वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है 
   ~मिर्जा ग़ालिब

◆तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो तुम को देखें कि 
   तुम से बात करें
   ~अज्ञात
  【मुख़ातिब=मोजूद,सामने】
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◆वक़्त दो मुझ पर कठिन गुज़रे हैं सारी उम्र 
   इक तिरे आने से पहले
   इक तिरे जाने के बाद 
     ~ मुज़्तर ख़ैराबादी

◆कोई होठों पे उँगली रख गया था 
  उसी दिन से मैं लिख कर बोलता हूँ 
    ~  फ़हमी बदायुनी

◆मुझको ये आरज़ू वो उठायें नक़ाब ख़ुद, 
   उन को ये इन्तज़ार तक़ाज़ा करे कोई । 
    ~ मज़ाज़ लखनवी

◆जाने किस रंग से रूठेगी तबीअत उस की
  जाने किस ढंग से अब उस को मनाना होगा
        ~अनवर मसूद

◆पहली दफ़ा है कि मुझमें तू छलका है 
   मेरे रंगों में कुछ रंग है तेरे जैसे भी
       ~ अज्ञात

◆वो होटल था, वहां पर कौन कहता,
  सुनो जी, चाय  ठण्डी हो रही है !!
     ~  फ़हमी बदायूनी


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